अबोध गलती
अस्पताल के जनाने वार्ड में
लगा हुआ था मजमा
भीड़ पर भीड़ जुट रही थी
हो रहा हो जैसे कोई नगमा।
शोर-शराबे के बीच
गूँज उठती थी किसी माँ के
व्यथित ह्रदय की टीस
'हाय मेरा बच्चा'।
किसी दुर्घटना के अंदेशे से
मेरा ह्रदय काँप उठा
ठिठक कर मैं वहाँ झाँक उठा।
भीड़ के बीच
तीन नव प्रसूताएं
अलग-अलग वेशभूषाएं
और अलग-अलग मजहबों की बैठी थीं
तीनों के ही आँचल से
दूध की धार बह रही थी
तीनों ही के चेहरों पर
मात्रत्व की कांति थी।
बड़े ही असमंजस में
अनजान भय के साए में
अपनी ममता से दूर थीं
ममत्व के बिछड़ने की टीस
और आँचल के दर्द से
वे रो रहीं थीं।
वहीं पास में तीन नर्सें
तीन नवआगन्तुकों को
अपने-अपने आँचल में समेटे
सहमीं सहमीं खड़ीं थीं।
तीनों ही मासूम और कोमल बच्चे
दुनियाँ के रस्मो-रिवाजों से अनजान
ढूँढ रहे थे अपनी-अपनी पहचान
बंद आँखों से वे
सारा संसार झाँक रहे थे
हर स्त्री में अपनी माँ की छवि देख रहे थे।
रुदन और क्रंदन के बीच
क्या हुआ, क्या हुआ,
शोर हो रहा था
पर वहाँ क्या हुआ है
हर कोई अनजान था।
मैंने डरते- डरते
वहाँ एक प्रश्न उछाला
'सिस्टर माजरा क्या है'
क्या घटित हुआ
और ये नजारा क्या है।
डरती सहमती हुई
एक नर्स बोली
'भाई साहब' गजब हो गया है
हमसे एक गलती हो गई है बड़ी ही भोली
हम तीनों
इन तीनों बच्चों की तीमारदारी के लिए
अलग-अलग तैनात थे
पर भूलवश हमनें तीनों ही बच्चों को
एक साथ नहला दिया
तीनों ही बच्चों को जाति-पाँति की दीवार से हटकर
एक सा प्यार दिया।
हमारे इस प्यार में हमारा ध्यान हट गया
कौन बच्चा किस का है, का भेद मिट गया।
हम तीनों में ही इंसान का रूप देखने लगे
मासूमों की किलकारियों से खेलने लगे।
पर जब हमारा ध्यान टूटा
हमें अपनी गलती के अहसास से पसीना छूटा
हम बच्चों की पहचान ही भूल गए
कौन किस माँ का बेटा है
सभी ने तो एक ही रूप-रंग अपने में समेटा है।
हमने डरते डरते अपनी गलती
यहाँ बयान कर दी
कौन किसका बच्चा है
ये जिम्मेदारी माँओं को सौंप दी।
पर क्या करें हम
माँएं भी नहीं पहचान पा रहीं हैं
कि किसने लिया है उनकी कोख से जनम
सभी दूसरे के जाए बच्चे को नहीं लेना
चाह रहीं हैं
इन मासूमों को गोद लेने से भी डर रहीं हैं।
बच्चे भूख से बिलख रहे हैं
अपनी माँओं के प्यार का साया ढूँढ रहे हैं।
अब आप ही बताएं
हम कैसे करें इनकी पहचान
कौन हिन्दू, कौन सिख और कौन मुसलमान।
हम अपनी गलती मान रहे हैं
तीनों से ही एक-एक बच्चा लेने को कह रहे हैं
पर तीनों ही हमारी बात नहीं मान रहीं हैं
और हम अपनी नौकरी जाने से डर रहीं हैं।
पता नहीं भगवान को भी
क्या मजाक सूझता है
हमारी विनती से भी
उसका दिल नहीं पसीजता है।
कितनी ही बार हम अपना दुखड़ा रो चुके हैं
कि भगवान हमारी मुश्किलें आसान कर दो
जन्म लेते ही बच्चे को उसकी
कुछ अलग पहचान दे दो।
आज हमारी गलती से
तीनों बच्चे अपने-अपने परिवार के होते हुए
अनाथ हो गए हैं
और उनकी माँओं की कोख भी
औलाद होते हुए भी सूनी है।
अब हम अपनी गलती का
प्रायश्चित करेंगे
और आजन्म
कुँवारी रहकर
कुँवारी माँ बनेंगे।।
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